यमुना किनारे बसी बस्तियों पर संकट, सरकारी आदेश से बढ़ी चिंता
नई दिल्ली: यमुना बाजार घाट पर रहने वाले परिवारों के सिर पर जब से बेदखली का सरकारी नोटिस आया है, तब से यहां के बाशिंदों की रातों की नींद उड़ गई है। दशकों से इस तट को अपना घर समझने वाले लोग अब गहरे मानसिक तनाव और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हैं। अपनी पुश्तैनी विरासत और आशियाने को इतने कम समय में छोड़ने के फरमान ने बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक को भावुक कर दिया है, जिससे स्थानीय लोगों में प्रशासन के प्रति गहरा रोष और दुख व्याप्त है।
पुश्तैनी विरासत और विस्थापन का गहरा दर्द
यमुना किनारे बसे इन पंडों और उनके परिवारों का कहना है कि यह केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं बल्कि उनकी कई पीढ़ियों की यादें और धार्मिक आस्था का केंद्र है। स्थानीय निवासियों के अनुसार उनके पूर्वजों ने इसी घाट पर पूजन कार्य कर अपना जीवन व्यतीत किया था, और अब अचानक बिना किसी ठोस विकल्प के उन्हें बेघर कर देना किसी त्रासदी से कम नहीं है। विस्थापन के डर से सहमे इन लोगों ने अब न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है क्योंकि उनका मानना है कि बिना घर-बार खोए वे एक जिंदा लाश के समान हो जाएंगे।
भेदभाव के आरोप और पुनर्वास की मांग
घाट के निवासियों ने सरकार की इस कार्रवाई को भेदभावपूर्ण करार देते हुए सवाल उठाया है कि यदि यह पूरा क्षेत्र ओ-जोन के अंतर्गत आता है, तो मजनू का टीला से लेकर अक्षरधाम तक के अन्य हिस्सों पर समान कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है। स्थानीय एसोसिएशन का तर्क है कि केवल पंडा परिवारों को निशाना बनाना तर्कसंगत नहीं है और प्रशासन को कोई भी सख्त कदम उठाने से पहले उनके रहने तथा रोजगार की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए। वे सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं कि बिना किसी पुनर्वास योजना के वर्षों से रह रहे नागरिकों को बेसहारा छोड़ना अमानवीय कृत्य है।
यमुना के प्रदूषण और जीवन रक्षक भूमिका पर तर्क
नदी के साथ अपने अटूट रिश्ते का हवाला देते हुए स्थानीय लोगों ने बताया कि एक समय था जब यमुना का जल इतना निर्मल था कि वे इसे पीने और खाना बनाने के काम में लाते थे। उनका कहना है कि नदी को गंदा करने का आरोप उन पर लगाना सरासर गलत है, क्योंकि प्रदूषण का असली कारण औद्योगिक रसायन और शहरों का गंदा नाला है, जबकि वे तो खुद यमुना की सफाई और वहां आने वाले श्रद्धालुओं की जान बचाने का कार्य करते हैं। 70 वर्षीय बुजुर्ग महिलाओं से लेकर छोटे बच्चों तक की पूरी दुनिया इसी घाट पर टिकी है, इसलिए वे मांग कर रहे हैं कि उनकी शिक्षा और दैनिक जीवन को बर्बाद होने से बचाने के लिए प्रशासन को सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए।

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