यमुना किनारे बड़ा खुलासा, ओ-जोन में 90 अवैध बस्तियां; 15.38 हेक्टेयर जमीन खाली
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने यमुना के डूब क्षेत्र (Floodplain/O-Zone) में बसी अवैध बस्तियों के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ दिया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को सौंपी गई ताजा रिपोर्ट में डीडीए ने यमुना तट पर मौजूद अतिक्रमण का विस्तृत ब्यौरा पेश किया है।
अतिक्रमण का पैमाना और कार्रवाई
डीडीए की रिपोर्ट के अनुसार, यमुना के ओ-जोन क्षेत्र में अवैध निर्माण की स्थिति काफी गंभीर है:
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अवैध कॉलोनियां: लगभग 9,700 हेक्टेयर के ओ-जोन क्षेत्र में करीब 90 अवैध कॉलोनियां चिन्हित की गई हैं, जो 807 हेक्टेयर में फैली हुई हैं।
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सरकारी जमीन पर कब्जा: इस क्षेत्र में डीडीए की कुल 3,969.54 हेक्टेयर जमीन है, जिसमें से 184.2 हेक्टेयर पर अवैध कब्जा पाया गया।
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अब तक की रिकवरी: प्रशासन ने अब तक 15.38 हेक्टेयर जमीन को कब्जामुक्त करा लिया है, जबकि शेष हिस्से पर कार्रवाई निरंतर जारी है।
यमुना प्रदूषण का बड़ा कारण
अदालत और डीडीए ने इन बस्तियों को हटाने के पीछे पर्यावरण सुरक्षा को मुख्य कारण बताया है। इन कॉलोनियों का अनुपचारित गंदा पानी और सीवर सीधे यमुना में प्रवाहित हो रहा है, जिससे नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) तबाह हो रहा है। न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ये निर्माण रातों-रात नहीं हुए, बल्कि वर्षों की लापरवाही का परिणाम हैं।
भविष्य की रणनीति: ड्रोन सर्वे और एसटीएफ
कार्रवाई को पारदर्शी और सख्त बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं:
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ड्रोन मॉनिटरिंग: पूरे इलाके का दोबारा ड्रोन सर्वे कराया जाएगा ताकि नए अतिक्रमण की पहचान हो सके।
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स्पेशल टास्क फोर्स (STF): डीडीए के उपाध्यक्ष (Vice Chairman) के नेतृत्व में एक एसटीएफ का गठन किया गया है जो इस अभियान की निगरानी करेगी।
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सार्वजनिक नोटिस: निर्माणाधीन क्षेत्रों में नोटिस लगाए जाएंगे ताकि लोग अवैध निर्माण की शिकायत कर सकें। इस कार्य में दिल्ली पुलिस को भी पूर्ण सहयोग के निर्देश दिए गए हैं।
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जवाबदेही: लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
रजिस्ट्री पर रोक और रिवरफ्रंट विकास
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ओ-जोन क्षेत्र में जमीन की रजिस्ट्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। कानूनी पेचीदगियों को सुलझाने के लिए केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय से परामर्श मांगा गया है।

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