भारतीय युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा डिजीटली युग?
नई दिल्ली। आम तौर पर धारणा है कि भारत में मजबूत पारिवारिक बंधन, धार्मिक रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन पश्चिमी देशों में युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य संकट से बचाते हैं लेकिन नए वैश्विक आंकड़ों से पता चलता है कि यह सुरक्षा कवज तेजी से कमजोर होने लगा है। एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय युवा जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा संघर्ष कर रहे हैं। लोग रोजमर्रा की जिंदगी को कितनी अच्छी तरह से सामना कर पाते हैं, सोच पाते हैं, महसूस कर पाते हैं और काम कर पाते हैं। साथ ही उन सामाजिक और जीवनशैली संबंधी कारकों पर भी गौर किया जाता है जो इन नतीजों को प्रभावित करते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट में सक्षम 18 से 34 साल के भारतीयों में माइंड हेल्थ कोशेंट (एमएचक्यू) 33 है जो 41 के वैश्विक औसत से नीचे है लेकिन बुजुर्ग भारतीयों का मामला इसके विपरीत है जहां 55 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों का एमएचक्यू 96 है। ये आंकड़े साफ तौर पर एक पीढ़ीगत गहरी खाई को दर्शाते हैं। मुख्य वैज्ञानिक ने कहा कि भारत के युवा वैश्विक औसत से थोड़ा ही नीचे हैं, लेकिन बुजुर्गों के मामले में गिरावट 63 अंक पर बहुत बड़ी है। यह अंतर वैश्विक औसत से भी ज्यादा है।
भारत कई विकसित देशों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। भारत के युवा जापान और ब्रिटेन समेत करीब 24 देशों में अपने साथियों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन वैश्विक रैंकिंग के मामले में भारत नीचे से तीसरे पायदान पर है। इससे पता चलता है कि भारत इस संकट से अछूता नहीं है बल्कि वह बाद में इससे ग्रस्त हुआ है। अध्ययन में जीवनशैली में दो आधुनिक बदलाव का पता चलता है। पहला बदलाव है आहार। करीब 44 फीसदी भारतीय युवा नियमित तौर पर अल्ट्रा-प्रॉसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, जबकि बुजुर्गों में यह आंकड़ा महज 11 फीसदी है। जो आबादी हर दिन अल्ट्रा-प्रॉसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करती है, वह मानसिक स्वास्थ्य के बोझ में करीब एक तिहाई तक योगदान करती है। उन्होंने उन बातों की ओर इशारा किया जो भावनात्मक और संज्ञानात्मक नियंत्रण को बाधित करती हैं।
दूसरा बदलाव है स्मार्टफोन। भारतीय युवाओं को अमीर देशों के युवाओं के मुकाबले स्मार्टफोन बाद यानी औसतन 16.5 वर्ष की आयु में मिले हैं, लेकिन इसमें तेजी से गिरावट हो रही है। वैज्ञानिक ने कहा कि इंटनेट चलाने में सक्षम पूरी आधुनिक आबादी बुनियादी तौर पर एक ही नाव पर सवार है। बहरहाल, भारत में पारिवारिक बंधन और आध्यात्मिकता अभी भी काफी मायने रखती है लेकिन अब केवल वे ही पर्याप्त नहीं हैं। खानपान की आदत तेजी से बदल रही है और डिजिटल तकनीक की उपलब्धता में भी बदलाव हो रहा है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत को मिलने वाला लाभ अब बेहद नाजुक और अस्थायी साबित हो सकता है।

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