ओवैसी का बड़ा बयान: वफादारी साबित करने के लिए वंदे मातरम का सहारा जरूरी नहीं
नई दिल्ली।ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राष्ट्रगीत और देश के प्रति वफादारी को लेकर एक विवादित टिप्पणी की है। एक हालिया इंटरव्यू के दौरान ओवैसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वंदे मातरम गाना या इसे सम्मान देना किसी भी नागरिक की देश के प्रति वफादारी का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि ये संगठन भारत को एक धार्मिक राष्ट्र में तब्दील करने की कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान हम लोग शब्द से शुरू होता है, न कि भारत माता की जय जैसे नारों से। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि यह देश के हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार की गारंटी देता है।
यह विवाद तब गहराया जब केंद्र सरकार ने 12 फरवरी को एक नया आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत अब राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान ही सम्मान देना अनिवार्य कर दिया गया है। नए नियमों के अनुसार, अब राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य होगा, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है। इससे पहले तक आमतौर पर मूल गीत के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। ओवैसी ने अपने संबोधन में सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की भी तीखी आलोचना की। उन्होंने जस्टिस कपूर कमीशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि आयोग ने सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या का साजिशकर्ता माना था। इसके अलावा, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कयामत शब्द के इस्तेमाल पर भी कटाक्ष किया। ओवैसी ने चुटकी लेते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को कम से कम एक उर्दू शब्द का हिंदी अर्थ पता होना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं पर विराम लगाते हुए ओवैसी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से जुड़े किसी भी अविश्वास प्रस्ताव में अपनी भूमिका से साफ इनकार किया। तेलंगाना की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि चुनाव के दौरान भाजपा जिस तरह उनका नाम लेती है, उससे लगता है कि वे उन्हें काफी पसंद करते हैं।

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